शनिवार, 2 मई 2026

मेरे चित्रों की एक प्रदर्शनी " "माटी के रंग" मुंबई की विश्वविख्यात जहांगीर कला दीर्घा मुंबई में


मेरे चित्रों की एक प्रदर्शनी "माटी के रंग" 

मुंबई की विश्वविख्यात जहांगीर कला दीर्घा मुंबई में 

पिछले दिनों (07 से 13 अप्रैल 2026 तक) मेरे चित्रों की एक प्रदर्शनी "माटी के रंग" मुंबई की विश्वविख्यात जहांगीर कला दीर्घा मुंबई में आयोजित हुयी जिसमें माननीय अतिथियों के रूप में -


माटी के रंग चित्रकार डाॅ.लाल रत्नाकर जी को साधुवाद। ‘‘चित्र चुप रहकर भी दृश्य को देखकर यही लगता है कि अतीत की नींव पर भविष्य का निर्माण’’ continuty with change शुभकामनाओं के साथ।
कृपा शंकर  सिंह
(पूर्व गृह राज्यमंत्री -महाराष्ट्र सरकार)
07 अप्रैल 2026 


Amazing exhibition of paintings I have ever come across. I would like to thank Dr. Lal Ratnakar ji for giving me opportunity to be part of it. Mati ke Rang is not just flowing colours and water, but it is the real truth of our ethnicity, culture and beauty women we come across in village. My best wishes to you for future endeavours.
Regards. 
Dr. Ragini Sonker (MLA) Jaunpur, Macchlishahr.7/04/2026,


डा० लाल रत्नाकर की कला का उत्स ग्रामीण जीवन वही आधी आबादी यानी स्त्री जीवन से इतने गहरे तक जुड़ा है कि एक क्रांतिकारी वैचारिक आन्दोलन का प्रतिनिधित्व करता है। स्त्री-जीवन के तमाम पहलू इनके चित्रों में  बोलते-बतियाते हैं। खेती-बाड़ी, सिलाई कढ़ाई, खाना का चैकाचूल्हा संभालने वाली इन चित्रों में अपने वजूद की पहचान और अपने हक के लिए ब जिद है। 
जातीय भेद-भाव तथा आर्थिक विषमता के बर अक्स डा० लाल इत्नाकर के चित्रों की स्त्री समानता एवं पूरे सम्मान की मुस्तहक है।
चित्रों में सामाजिक रूढ़ परंपराओं के ढा़हने के संकेत  हमें आगे की लड़ाई के लिए सोचने को मजबूर करता है।
मेरा मानना है कि डा० लाल रत्नाकर के चित्रों के द्वारा स्त्री पक्ष का ही नहीं बल्कि मुकम्मल समाजवाद का झंडा बुलंद होता है तथा इस में अगुआई करने वाले वे भारत के पहले कलाकार है। उनके लिए मंगल कामना है।

बी आर विप्लवी 
लखनऊ
07.04.2026




डॉ. लाल रत्नाकर जी द्वारा चित्रित ’माटी के रंग’ प्रदर्शनी में देश के ग्रामीणांचल के उपेक्षित ’आधी आबादी’ के साथ साथ पूरे परिवेश को यथार्थपरक दृष्टिकोण से रचित है। तथाकथित अभिजात्य वर्ग एवं नयी पीढी को सामाजिक ताना-बाना समझने हेतु चित्रों की श्रृंखला अत्यंत उपयोगी साबित होगी. रंगों का चयन एवं तद्नुसार चित्रण अद्भुत है।  शुभकामनाएं..

अजय कुमार यादव 
प्रदेश उपाध्यक्ष संपा.










 "माटी के रंग" मुंबई की विश्वविख्यात जहांगीर कला दीर्घा मुंबई में इस प्रदर्शनी के उद्घाटन में एक नया प्रयोग किया गया जिसकी रूपरेखा मेरी बेटी डॉ श्रद्धा ने तैयार की थी। यथा ; प्रदर्शनी में फ़ीता काटकर अलग अतिथियों से काटने के लिए अलग अलग रंग के फीते लगाए गए उसके उपरांत अतिथियों का परिवारजनों द्वारा स्वागत। 
पुनः उसी क्रम में चित्रों का अवलोकन उसके उपरान्त क्रम से मेरी पुस्तिका में अतिथियों द्वारा टिप्पणी फिर जलपान और औपचारिक चर्चा। 


जहांगीर आर्ट गैलरी मुंबई में डॉ लाल रत्नाकर जी का चित्रलोक दर्शन 
                                              7अप्रैल 2026 जहांगीर आर्ट गैलरी, मुंबई।
"माटी के रंग" विषय पर आधारित एक चित्र प्रदर्शनी ने लोगों का मन मोह लिया। विश्व के प्रख्यात चित्रकार डॉ. लाल रत्नाकर के चित्रों की इस प्रदर्शनी में राजनीति से जुड़े नामचीन चेहरों के साथ ही अनगिनत प्रशासनिक अधिकारी व कला पारखी लोग शामिल हुए।उदघाटन अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में महाराष्ट्र के पूर्व गृह राज्यमंत्री श्री कृपा शंकर सिंह , अतिविशिष्ट अतिथि डॉ रागिनी सोनकर विधायक उत्तर प्रदेश विधान सभा, विशिष्ट अतिथि इंजीनियर बी आर विप्लवी (आई आर एस) प्रख्यात लेखक व श्री अजय कुमार यादव उपाध्यक्ष समाजवादी पार्टी, मराठी और हिन्दी के प्रसिद्ध साहित्यकार/पत्रकार रमेश यादव जी, वरिष्ठ वैज्ञानिक भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर, मुंबई सरोज जी विशेष रूप से उपस्थित रहे।
                             जहांगीर आर्ट गैलरी में डॉ लाल रत्नाकर के अद्भुत चित्र उनकी कला का वह बेजोड़ नमूना प्रस्तुत कर रहे थे जिसे देखकर हरेक आश्चर्यचकित हुए बिना नहीं रह सका। विश्व में आधी आबादी के चित्रकार के रूप में पहचाने जाने वाले चित्रकार डॉ लाल रत्नाकर के चित्रों में प्राकृतिक सौंदर्य इस प्रकार से झलकता है जैसे...वे अपनी माटी,अपनी सभ्यता,अपनी संस्कृति के स्वाभाविक रंगों से वास्तविकता में ढले हों। गौर से देखने पर महसूस होने लगता है कि उनके ये चित्र बोल रहे हैं। अपनी संवेदनाएं अपनी व्यथा अपना पक्ष रख रहे हैं। एक आम चित्रकार तस्वीरों में ऐसे भाव नहीं ला सकता। उसके लिए साधना की आवश्यकता होती है। वर्तमान में ऐसे सच्चे साधक के रूप में डॉ लाल रत्नाकर का नाम बेबाकी से लिया जा सकता है। उनके चित्रों में सबसे ख़ास बात यह है कि वे आधुनिक चकाचौंध से परे अपनी माटी के रंग अपनी माटी की महक को संजोकर रखते हैं। ग्राम्य परिवेश के साथ साथ स्त्री के बाह्य एवम् आंतरिक भाव को बड़ी ही बारीकी से सहजता और सरलता से अपने चित्रों में clearitiy से दिखाने में पूर्णरूप से सक्षम हैं।
                                इस अवसर पर मुख्य अतिथि श्री कृपा शंकर जी ने दूरदर्शन एवम् मीडिया के सामने अपने वक्तव्य में डॉ लाल रत्नाकर के चित्रों की खुले दिल से प्रशंसा की। साथ कहा कि प्रदर्शनी में जिस प्रकार से माटी के रंग विषय रखा है यह इस बात पर मोहर लगाता है कि रत्नाकर जी अपने कला पथ में एक लंबे सफ़र के पश्चात् भी अपनी माटी,सभ्यता एवम् संस्कृति के अमूल्य रंगों को फीका नहीं पड़ने दे रहे। उन्हें सहेजे हुए हैं।
                                  प्रदर्शनी में इनके चित्रों को देखने के लिए देश विदेश से कला पारखी पहुंच रहे हैं।











  


रविवार, 22 अप्रैल 2012

आधी आवादी और और हमारे चित्र

आधी आवादी और और हमारे चित्र
भारतीय राजनीति के आज और कल
डॉ.लाल रत्नाकर 

दरअसल अभी हाल के चुनाओं में महिलाओं ने जिस प्रकार पुरुष वर्चस्व वादी दलों को किनारे कर अपना आधिपत्य बनाया है, वह इस समय की एक बड़ी सांकेतिक पहल है, भले ही दलित और पिछड़े की औरतें इसमें न हो लेकिन महिला आरक्षण की पुरुष प्रधान सोच कहीं न कहीं इन नारियों की राजनितिक बढ़ोत्तरी के लिए जिम्मेदार है.

१.शीला दीक्षित  २.मायावती  ३.ममता  ४.जयललिता ५. वसुन्धरा राजे  ६. उमा भारती ६. सुषमा स्वराज

ये बात ज़रा पुरानी हो गयी है पर हम यह नहीं कह सकते कि महिलाओं ने अभी कुछ कम कर दिया हो, इस बीच इनके साथ बढे जुर्म एक अलग कहानी कहते हैं जिनमें साधू संतों मीडिया मालिकों या बिगड़े हुए नवजवानों का सवाल हो या इसके पीछे के किसी और  तरह के विचार हों लेकिन आज यह आधी आवादी निरंतर जागरूक होने के लिए आगे आ रही है अब सवाल यह है कि यह मूल्यांकन कौन  करेगा, वहीँ स्त्रियों के प्रती घटिया सोच वाला पुरुष समाज ?
डॉ लाल रत्नाकर की  कृति 
आज कि स्त्री /महिला जागरूक है उसे अपने हित के अनेक सवाल उठाने में कोई संकोच नहीं है, हर तरह से आगे बढ़ना / बढ़ाना चाहती है अपने समग्र को। पर जब बात आती है सामजिक सरोकारों कि तो पुरुषों वाला भेदभाव यहाँ भी हाज़िर हो जाता है। पिछले दिनों कि बात है मेरी एक छात्रा ने बताया कि उसकी सहेली को इस बात से चिढ है कि उसे कुछ राजकीय सहूलियतें मिल जाती हैं प्रवेश आदि में, पर टॉप करने के लिए तो मेहनत ही करनी पड़ती है, लागता है उसकी सहेली को उसका टॉप करना रास नहीं आ रहा होगा।  जो भी हो पर ये वही सामजिक विषमता यहाँ भी घर किये है -

लेखक ; डॉ लाल रत्नाकर को गुरुकुल पब्लिक स्कूल के स्टाफ और गैरज़ियन के साथ साथ में हैं डॉ एकता सिंह।  
महिलाओं में भारत कि आत्मा ही नहीं बसती है बल्कि उनसे इस मुल्क कि पहचान होती हैं, जो अपने आप में उनके लिए गौरव का विषय है, पर यह सब कुछ इतनी आसानी से नहीं होता है ये सब भी उनके लिए ऐसे ही नहीं है जिसके लिए उन्हें 'धरती' जैसा उर्वरा बनना पड़ता है। 

अब रही बात हमारे राजनैतिक स्वरुप और महिलाओं के राजनैतिक वर्चस्व की तो अभी भी बहुत कुछ होना बाकी है, महिलाओं के विविध सदनों की आरक्षित स्थिति और उनके अम्लीय रूप की तो वह भी अधर में ही है, जबतक उन्हें आरक्षण नहीं मिलता तब तक उनकी निश्चित संख्या की उपस्थिति संभव नहीं दिखती। पर इसमें जो सबसे खतरनाक मोड़ है वह यह कि यहाँ तमाम उनलोगों की उपस्थिति नहीं होगी जो समाज के उन तबकों से आती  हैं जो मुस्लिम, पिछड़े और दलित हैं अथवा वर्तमान समय में आर्थिक रूप से विपन्न हैं। आर्थिक विपन्नता के सवाल पर समाज में अजीब तरह का आकर्षण है की यह आधार ही आरक्षण का होना चाहिये  यही वह सवाल है जिसके चलते  धनवान और निर्धन की पोल खुलने लगी है ? अतः यह सवाल सामाजिक विस्तार का ही रहना चाहिए। 

महिलाओं का सांस्कृतिक सरोकार ; 
सबसे बड़ा काम तो  सांस्कृतिक सरोकारो का है जिसे हमारी महिलायें ही संभालती है, धर्म जिसका बहुत बड़ा सम्बाहक तो है पर इसी धर्म से उनकी प्रताड़ना भी होती है, यथा पुरुष वर्चस्व वाले इस समाज में महिलायें बहुत ही करीने से समाज के हासिये की सामग्री के रूप में खड़ी कर दी जाती हैं (यहाँ भी शिक्षा, सहभागिता, सम्पदा की अपनी स्थिति में बहुत कुछ सामाजिक सरोकारों पर आधारित है ) यही कारण है की उनकी सोच में सामाजिक कुरीतियां घर कर जाती हैं और वे उससे आजीवन बाहर निकल ही नहीं पाती हैं।  मुझे लगता है सांस्कृतिक सरोकार ही इसके लिए उतने ही दोषी भी हैं। 

   

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