आधी आवादी और और हमारे चित्र
महिलाओं में भारत कि आत्मा ही नहीं बसती है बल्कि उनसे इस मुल्क कि पहचान होती हैं, जो अपने आप में उनके लिए गौरव का विषय है, पर यह सब कुछ इतनी आसानी से नहीं होता है ये सब भी उनके लिए ऐसे ही नहीं है जिसके लिए उन्हें 'धरती' जैसा उर्वरा बनना पड़ता है।
अब रही बात हमारे राजनैतिक स्वरुप और महिलाओं के राजनैतिक वर्चस्व की तो अभी भी बहुत कुछ होना बाकी है, महिलाओं के विविध सदनों की आरक्षित स्थिति और उनके अम्लीय रूप की तो वह भी अधर में ही है, जबतक उन्हें आरक्षण नहीं मिलता तब तक उनकी निश्चित संख्या की उपस्थिति संभव नहीं दिखती। पर इसमें जो सबसे खतरनाक मोड़ है वह यह कि यहाँ तमाम उनलोगों की उपस्थिति नहीं होगी जो समाज के उन तबकों से आती हैं जो मुस्लिम, पिछड़े और दलित हैं अथवा वर्तमान समय में आर्थिक रूप से विपन्न हैं। आर्थिक विपन्नता के सवाल पर समाज में अजीब तरह का आकर्षण है की यह आधार ही आरक्षण का होना चाहिये यही वह सवाल है जिसके चलते धनवान और निर्धन की पोल खुलने लगी है ? अतः यह सवाल सामाजिक विस्तार का ही रहना चाहिए।
महिलाओं का सांस्कृतिक सरोकार ;
सबसे बड़ा काम तो सांस्कृतिक सरोकारो का है जिसे हमारी महिलायें ही संभालती है, धर्म जिसका बहुत बड़ा सम्बाहक तो है पर इसी धर्म से उनकी प्रताड़ना भी होती है, यथा पुरुष वर्चस्व वाले इस समाज में महिलायें बहुत ही करीने से समाज के हासिये की सामग्री के रूप में खड़ी कर दी जाती हैं (यहाँ भी शिक्षा, सहभागिता, सम्पदा की अपनी स्थिति में बहुत कुछ सामाजिक सरोकारों पर आधारित है ) यही कारण है की उनकी सोच में सामाजिक कुरीतियां घर कर जाती हैं और वे उससे आजीवन बाहर निकल ही नहीं पाती हैं। मुझे लगता है सांस्कृतिक सरोकार ही इसके लिए उतने ही दोषी भी हैं।
भारतीय राजनीति के आज और कल
डॉ.लाल रत्नाकर
दरअसल अभी हाल के चुनाओं में महिलाओं ने जिस प्रकार पुरुष वर्चस्व वादी दलों को किनारे कर अपना आधिपत्य बनाया है, वह इस समय की एक बड़ी सांकेतिक पहल है, भले ही दलित और पिछड़े की औरतें इसमें न हो लेकिन महिला आरक्षण की पुरुष प्रधान सोच कहीं न कहीं इन नारियों की राजनितिक बढ़ोत्तरी के लिए जिम्मेदार है.
१.शीला दीक्षित २.मायावती ३.ममता ४.जयललिता ५. वसुन्धरा राजे ६. उमा भारती ६. सुषमा स्वराज
ये बात ज़रा पुरानी हो गयी है पर हम यह नहीं कह सकते कि महिलाओं ने अभी कुछ कम कर दिया हो, इस बीच इनके साथ बढे जुर्म एक अलग कहानी कहते हैं जिनमें साधू संतों मीडिया मालिकों या बिगड़े हुए नवजवानों का सवाल हो या इसके पीछे के किसी और तरह के विचार हों लेकिन आज यह आधी आवादी निरंतर जागरूक होने के लिए आगे आ रही है अब सवाल यह है कि यह मूल्यांकन कौन करेगा, वहीँ स्त्रियों के प्रती घटिया सोच वाला पुरुष समाज ?
डॉ लाल रत्नाकर की कृति
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आज कि स्त्री /महिला जागरूक है उसे अपने हित के अनेक सवाल उठाने में कोई संकोच नहीं है, हर तरह से आगे बढ़ना / बढ़ाना चाहती है अपने समग्र को। पर जब बात आती है सामजिक सरोकारों कि तो पुरुषों वाला भेदभाव यहाँ भी हाज़िर हो जाता है। पिछले दिनों कि बात है मेरी एक छात्रा ने बताया कि उसकी सहेली को इस बात से चिढ है कि उसे कुछ राजकीय सहूलियतें मिल जाती हैं प्रवेश आदि में, पर टॉप करने के लिए तो मेहनत ही करनी पड़ती है, लागता है उसकी सहेली को उसका टॉप करना रास नहीं आ रहा होगा। जो भी हो पर ये वही सामजिक विषमता यहाँ भी घर किये है -
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| लेखक ; डॉ लाल रत्नाकर को गुरुकुल पब्लिक स्कूल के स्टाफ और गैरज़ियन के साथ साथ में हैं डॉ एकता सिंह। |
अब रही बात हमारे राजनैतिक स्वरुप और महिलाओं के राजनैतिक वर्चस्व की तो अभी भी बहुत कुछ होना बाकी है, महिलाओं के विविध सदनों की आरक्षित स्थिति और उनके अम्लीय रूप की तो वह भी अधर में ही है, जबतक उन्हें आरक्षण नहीं मिलता तब तक उनकी निश्चित संख्या की उपस्थिति संभव नहीं दिखती। पर इसमें जो सबसे खतरनाक मोड़ है वह यह कि यहाँ तमाम उनलोगों की उपस्थिति नहीं होगी जो समाज के उन तबकों से आती हैं जो मुस्लिम, पिछड़े और दलित हैं अथवा वर्तमान समय में आर्थिक रूप से विपन्न हैं। आर्थिक विपन्नता के सवाल पर समाज में अजीब तरह का आकर्षण है की यह आधार ही आरक्षण का होना चाहिये यही वह सवाल है जिसके चलते धनवान और निर्धन की पोल खुलने लगी है ? अतः यह सवाल सामाजिक विस्तार का ही रहना चाहिए।
महिलाओं का सांस्कृतिक सरोकार ;
सबसे बड़ा काम तो सांस्कृतिक सरोकारो का है जिसे हमारी महिलायें ही संभालती है, धर्म जिसका बहुत बड़ा सम्बाहक तो है पर इसी धर्म से उनकी प्रताड़ना भी होती है, यथा पुरुष वर्चस्व वाले इस समाज में महिलायें बहुत ही करीने से समाज के हासिये की सामग्री के रूप में खड़ी कर दी जाती हैं (यहाँ भी शिक्षा, सहभागिता, सम्पदा की अपनी स्थिति में बहुत कुछ सामाजिक सरोकारों पर आधारित है ) यही कारण है की उनकी सोच में सामाजिक कुरीतियां घर कर जाती हैं और वे उससे आजीवन बाहर निकल ही नहीं पाती हैं। मुझे लगता है सांस्कृतिक सरोकार ही इसके लिए उतने ही दोषी भी हैं।



















