भारत एक जाती प्रधान देश है जिसमे अनेकों जातियां हैं, इन जातीय पुरुषों एवं स्त्रियों की अलग अलग पहचान है, इसी पहचान के कारण सदियों से उनके जीवन यापन-यथा रहन-सहन, शारीरिक संरचना, पहनावे, क्रियाकलापों से ही लगभग उनकी पहचान कर ली जाती है.
स्वाभाविक है इसका असर स्त्री पुरुष एवं बच्चों पर भी पड़ेगा, आनुवंशिक विकास की अवधारण यद्यपि वैज्ञानिक है पर अनुवंशिकीय अवधारणा जब अपना असर डालती है तो उस देश का विकास और मौजूदा समाज अपने अपनाए जा रहे उत्थान के किस मार्ग पर चल रहा है इसकी किसी को सुध नहीं हैं और न ही जीवन की परवाह ही।
समानांतर विविध व्यवस्था के चलते देश में जिस उभार की कल्पना की जाती है उसमें धर्म, वर्ग, लिंग, जाति, क्षेत्र एवं स्वाभाव आदि के भेद क्या हैं उनसे उस व्यक्ति के कर्म (रचना कर्म) या उनके कर्मों को कैसे प्रभावित करते हैं इस विचार किया जाना ही मूलतः हमारा राष्ट्रीय उद्येश्य होना चाहिए था परन्तु इस मौलिकता से परे जिस पाखण्ड और निराधार अन्धानुकर्निय समाज निर्मित किया गया उसका असर हमारी हर व्यवस्था को कमजोर कर रहा है . यही कारण रहा है की असंतोष का क्षण कभी कम नहीं हुआ, भले ही हम संतोष का प्रदर्शन करने का दिखावा करते हों परन्तु रात दिन हम उसे संभालने और बढाने में ही व्यय कर दिए हैं।
स्वाभाविक है इसका असर स्त्री पुरुष एवं बच्चों पर भी पड़ेगा, आनुवंशिक विकास की अवधारण यद्यपि वैज्ञानिक है पर अनुवंशिकीय अवधारणा जब अपना असर डालती है तो उस देश का विकास और मौजूदा समाज अपने अपनाए जा रहे उत्थान के किस मार्ग पर चल रहा है इसकी किसी को सुध नहीं हैं और न ही जीवन की परवाह ही।
समानांतर विविध व्यवस्था के चलते देश में जिस उभार की कल्पना की जाती है उसमें धर्म, वर्ग, लिंग, जाति, क्षेत्र एवं स्वाभाव आदि के भेद क्या हैं उनसे उस व्यक्ति के कर्म (रचना कर्म) या उनके कर्मों को कैसे प्रभावित करते हैं इस विचार किया जाना ही मूलतः हमारा राष्ट्रीय उद्येश्य होना चाहिए था परन्तु इस मौलिकता से परे जिस पाखण्ड और निराधार अन्धानुकर्निय समाज निर्मित किया गया उसका असर हमारी हर व्यवस्था को कमजोर कर रहा है . यही कारण रहा है की असंतोष का क्षण कभी कम नहीं हुआ, भले ही हम संतोष का प्रदर्शन करने का दिखावा करते हों परन्तु रात दिन हम उसे संभालने और बढाने में ही व्यय कर दिए हैं।
इस आधार पर मूल्यांकन करने से सामाजिक ढांचा जिस खांचे में खड़ा है, सदियों तक वैसे ही खड़े रहने की स्थिति से इनकार नहीं किया जा सकता. क्योंकि यहाँ विद्वानों की जाति निर्धारित है, कामगारों की जाति निर्धारित है, गुंडों और लठैतों की जाति निर्धारित है, डकैतों की जाति निर्धारित है, इन्ताज़म्कारों की भी जाति निर्धारित है, गरीबों का खून चूसने वालों की जाति निर्धारित है. दूसरी ओर मंदिरों के पुजारियों की जाति निर्धारित है, स्कूलों,कालेजों,विश्वविद्यालयों में पढ़ाने वालों की जाति निर्धारित है, सेना में भर्ती के लिए जाति निर्धारित है, देश चलाने के लिए अफसरों कर्मचारियों की जाति निर्धारित है, व्यवसाय चलाने वालों की जाति निश्चित है, लड़ने भिड़ने वालों की जाति भी निश्चित कर दी गयी है. जहाँ सब कुछ जाति आधारित है वहां काबिलियत के मायने क्या हैं ?
अनेकों रिपोर्टों एवं अनेकों आन्दोलनों के बावजूद सबकुछ यथावत है ऐसा होने के पीछे के कारण क्या है ? यह एक नाकाबिलियत है व्यवस्था की जो उन लोगों को अधिकार और औरों का हिस्सा हड़पने का हक़ दे देता है जो अपराधी हैं, भ्रष्ट हैं, चरित्रहीन हैं, पदलोलुप हैं, स्वार्थी और लालची है दुर्भाग्य वश ये उनके सेनानी बन जाते हैं जो भ्रष्ट और बेईमान हैं. इन्हें ही 'हम' अपना मसीहा, मालिक, गुरु और नेता मान लेते हैं और ये सामाजिक पुरोधा हैं, जो बदलाव के बदले स्वयं ही बदल जाते हैं, भारतीय बदलाव का असली चेहरा कुछ इसी तरह का है. महिलाओं के सवाल पर भी कुछ येसा ही होता है. दरअसल कमोवेश यही हाल विभिन्न क्षेत्रों में इनका भी है, दलितों और पिछड़ों का भी है . क्योंकि जहाँ जहाँ जहाँ से नियंत्रण या स्वार्थ को तोड़ने का सवाल खड़ा होता है तो वे भी इसी के हिस्से हो जाते हैं, और यही कारण है की बदलाव की साड़ी सम्भावनाएं धरी रह जाती हैं .
तब लगता है की बदलाव ही बेमानी है क्यों न इसी राह को पकड़ें जिसमें संघर्ष नहीं है सहज है यही सहजता दरअसल बेईमानी की राह दिखाती है, यहीं से शुरू होता है अपराध।
सुनियोजित अपराध की अवधारणा;
पहले
साधारणतया भारत के सामान्य जीवन में गांव कई रूपों में नजर आता है। गरीबी, खुशहाली, दबंगई, नीरीहता, व मजदूर और मालिक। खेती किसानी से जुड़े अनेक उपक्रम, पर इन सबके मध्य भारतीय नारी ‘ग्राम्या’ विविध रूपों में। उन्ही के विविध रूपों में प्रस्तुत हैं ये चित्र-








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